#KUMBH 2019: सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण कर तपस्या करने वाले को मिलता है जो फल, वो एक माह के कल्पवास भर से मिल जाता है

प्रसून पांडेय

प्रयागराज. संगम नगरी में मकर संक्रांति के स्नान के साथ माघ मास का प्रारंभ हो जाएगा। संक्रांति पर प्रयाग में संगम स्नान करने का पौराणिक और धार्मिक महत्व है। विशेष तौर पर कुंभ ,अर्ध कुंभ में संक्रांति के स्नान को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक जानकारों के अनुसार माघ मास में भगवान सूर्य उत्तरायण होते हैं और मकर राशि में प्रवेश करते हैं। कहा जाता है कि संक्रांति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार भगवान शनि मकर राशि के स्वामी होते हैं । इसीलिए संक्रान्ति के दिन का दिन विशेष होता है।
मकर संक्रांति से ही सनातन धर्मावलंबी मेला क्षेत्र में अपना प्रवेश प्रारंभ कर देते हैं। मान्यता के अनुसार जब मनुष्य अपने सभी कार्यों से मुक्त होता है। तब संगम तट पर कल्पवास करता है। कल्पवास की परंपरा में एक पुरोहित के यहां 6 वर्ष या 12 वर्ष का कल्पवास करने के बाद कल्पवास करने वाले लोग सैंया दान कर अपने कर्मो का प्रायश्चित कर अपने ईश्वर को समर्पित कर देते है। संगम में स्नान और कल्पवास का आना मकर संक्रांति के बाद से पौषपूर्णिमा तक होता है। जो महाशिवरात्रि तक चलता है। जिसमें दूरदराज गांव और देश के अलग अलग हिस्सो से मनोकामना पूर्ति और ईश्वर की साधना के लिए लोग आते हैं।

सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर संगम का स्नान पूर्ण काल माना जाता है। संगम तट से पूजन अनुष्ठान और दीपदान के बाद सभी धार्मिक कार्य शुरू हो जाएंगे । मकर संक्रांति के स्नान के बाद विशेष तौर पर काले तिल गुड़ और चावल का दान किया जाता है । शनि को प्रसन्न करने के लिए काली उड़द का दान करते हैं। माघ मेले में आए श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक सेवा के लिए मेले में अलग-अलग स्थानों पर घाटों पर प्रसाद वितरण की व्यवस्था की जाती है। मकर संक्रांति पर विशेष तौर पर पूरे माघ मेला क्षेत्र में खिचड़ी वितरण होती है।

क्या है कल्पवास

त्रिवेणी संगम पर माघ मासभर निवास करने से पुण्य फल प्त होता है। संगम तट पर एक माह की इस साधना को ‘कल्पवास’ कहा गया है। कहा जाता है कि प्रयागराज के त्रिवेणी तट पर कल्पवास करने वाला की हर इच्छा को भगावान पूरा करते हैं।

ये है धार्मिक मान्यता

महाभारत में कहा गया है कि एक सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का जो फल है, माघ मास में कल्पवास करने भर से प्राप्त हो जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस के वध की क्षमता कल्पवास से ही प्राप्त की थी। ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों को कल्पवास करने से आत्मदर्शन का लाभ हुआ।

कितने समय का होता है कल्पवास

वैसे तो कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि की है। बहुत से श्रद्धालु जीवनभर माघ मास गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम को समर्पित कर देते हैं। विधान के अनुसार एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जा सकता है।